मन हो रहा हठीला बालक ,
जिद करता कुछ सुनने और सुनाने को,
याद आते हैं वो दिन हमें
जब प्रतीक्षा होती थी गर्मी के ऋतू की आने को |
जब मन में आस बनाते थे मामा के घर जाने की ,
और भाप के इनजन की गाड़ी में हम हिचकोले खाते थे |
उस धुआ उड़ाती रेल में
छुट्टी के सतरंगी सपने बुनते थे |
चिलचिलाती धूप में,
बगीचे से आम चुराया करते थे,
माली की आहट सुनकर,
दूर ओट में कही छिप जाते थे !
पकडे जाने पर खूब मरममत होती थी,
पर अगले दिन फिर वही दोहराया करते थे |
जब उस सूनी सी दोपहरी में
घर घर खेला करते थे ,
माँ से छुप कर उन्ही की साडी से हम घर बनाया करते थे !
फिर रात को नानी के आँचल में,
ध्रुव तारे की कहानी सुनते थे |
और दूर कहीं आकाश में ,
सप्तऋषि को देखा करते थे |
जब उस उजली सी रेखा को,
हम आकाश गंगा कहा करते थे |
अब कहाँ गए वो बाग़ बगीचे!
छिप गया कहीं वो ध्रुव तारा |
अब भी आती छुट्टी गर्मी की
पर संग लाती है सिर्फ अँधियारा |
जिसमे प्रतिपल बढती महत्वाकांक्षा,
प्रतियोगिता की धक्का मुक्की ,
सब कुछ पा लेने की जल्दी |
ये चक्रव्यूह है या मकड़ जाल,
खो गयी जिसमे हर मुस्कान!
अब तो बस यही प्रशन मन में है भरमाया,
क्या हमने अधिक खोया या इन्होने कम पाया?
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