Wednesday, 6 April 2011

तब और अब

मन हो रहा हठीला बालक ,
जिद करता कुछ सुनने और सुनाने को,
याद आते हैं वो दिन हमें 
जब प्रतीक्षा होती थी गर्मी के  ऋतू की  आने को |

जब मन में आस बनाते थे  मामा के घर जाने की ,
और भाप के इनजन की गाड़ी में  हम हिचकोले खाते थे |  
उस  धुआ उड़ाती रेल में  
छुट्टी के सतरंगी सपने बुनते थे |

चिलचिलाती धूप में, 
बगीचे से आम चुराया करते  थे, 
माली की आहट सुनकर, 
दूर ओट में कही छिप जाते थे !  
पकडे जाने पर खूब मरममत होती थी,
पर अगले दिन फिर वही दोहराया करते थे | 

जब उस सूनी सी दोपहरी में
घर घर खेला करते थे , 
माँ से छुप कर उन्ही की साडी से हम घर बनाया करते थे !
फिर रात को नानी के आँचल में,
ध्रुव तारे की कहानी सुनते थे | 
और दूर कहीं आकाश में ,
सप्तऋषि को देखा करते थे |
जब उस उजली सी रेखा को,
हम आकाश गंगा कहा करते थे |
   
अब कहाँ गए वो बाग़ बगीचे! 
छिप गया कहीं वो ध्रुव तारा | 
अब भी आती छुट्टी गर्मी की 
पर संग लाती है सिर्फ अँधियारा |
जिसमे प्रतिपल बढती महत्वाकांक्षा,  
प्रतियोगिता की धक्का मुक्की , 
सब कुछ पा लेने की जल्दी |
ये चक्रव्यूह है या मकड़ जाल, 
खो गयी जिसमे हर मुस्कान! 


अब तो बस यही प्रशन मन  में है भरमाया,  
क्या हमने अधिक खोया या इन्होने कम पाया?